अपराध बोध
जिनके इशारों पर मैं चलाता रहा पत्थर, उनकी मुस्कराहटों के पहचान ये पत्थर । जब लौट कर आये मेरे लिये, तब भी वे मासूमियत से मुस्कराते रहे। मैं तड़पता रहा दोनों दर्दों* से, वे मुस्कराते आम हमदर्दों से। * लौटे हुये पत्थरों की चोट और उनकी मुस्कराहट...
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MAVARK
मवार्क
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[26 Jan 2009 11:36 AM]



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