हाथ सरसों के पीले किये खेत ने
तारकों से टपकती हुई ओस में रात भर थी घुली गुनगुनी चांदनी एक नीहारिका के अधर पर टिकी गुनगुनाती रही मुस्कुरा रागिनी स्वर मिला ओस से, पांखुरी पर ठिठक एक प्रतिमा उभरने लगी रूप की चांद का बिम्ब चेहरा दिखाने लगा ओढ़नी ओढ़ कर थी खड़ी धूप की रत्नमय हो सजी वीथिक...
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राकेश खंडेलवाल
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[25 Jan 2009 20:28 PM]



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