नज़र नहीं आती
घटा से घिर गयी, बदली नज़र नहीं आती बहा ले नीर तू, उजली नज़र नहीं आती ये कैसा शोर हवाओं में आज़ दिखता है कहीं पे गिर गयी, बिजली नज़र नहीं आती हरेक ओर नुमाइश के दौर हैं यारों कोई सूरत भी तो, असली नज़र नहीं आती कभी सुलझे नहीं माथे की, सलवटें उसकी कोई ता...
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श्रद्धा जैन
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[25 Jan 2009 09:02 AM]



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