दशानन के चेहरे चिढ़ते बहुत हैं

एक हिंदुस्तानी की डायरी रावण की लंका सोने की थी। बहुत सारा निवेश आया होगा तभी तो बनी होगी सोने की लंका। उसके हित-मित्र, चाटुकार बड़े मायावी थे। स्वर्ण-मृग बनकर अपने यार के लिए वनवासियों की बीवियों को रिझाकर छल से उठा लिया करते थे। दशानन चिढ़ता बहुत था। निंदा तो छोड़िए, अपनी... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल रघुराज
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[23 Jan 2009 23:27 PM]

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