GAZAL

राही मासूम रज़ा का साहित्य कब ले आखिर रख्खल रही लोहे का गहनवा हो - हो किसनवा हो गज भर का करि यज तिह पर चढ़ती जवनियाँ भला नाहीं तन्नल बाड़िन हमनि का गरदनियाँ दप-दप जैसे तेगा चमके चमकत बाड़न अपने गटनवा हो - हो किसनवा हो कबले आखिर रख्खल रही लोहे का गहनवा हो - हो किसनवा हो तब ले ले ल... [पूरी पोस्ट]
writer डा. फीरोज़ अहमद
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[23 Jan 2009 22:57 PM]

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