हम आज तक अपने आप को माफ़ नहीं कर पाये कि भिंडरावाले हमारी क़ौम में पैदा हुआ, वे कैसे दुनिया से नजर मिलायेंगे जिनके घर-घर में अफ़जल गुरु हैं..........

मैनें आहुति बनकर देखा.. मैनें खिड़की से बाहर देखा तो रामपुर स्टेशन बीत रहा था। चलो गनीमत है अभी तक तो सही-सलामत चल रही है, अब समय से दिल्ली पहुँचा दे तो सही है। 25 दिसम्बर की सुबह मैं बरेली से दिल्ली कुछ कार्यवश जा रहा था, रात 12 बजे की श्रमजीवी एक्सप्रेस 9 घंटे के विलम्ब के... [पूरी पोस्ट]
writer कार्तिकेय
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[23 Jan 2009 15:07 PM]

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