"बैले दे ज़ू" देखकर पीयर के लिए
इससे तो बेहतर है अनजान लोगों से बतियाया जाए कुछ भी किताबों में घुसा लिया जाए सिर एक के बाद एक चार-पांच फ़िल्में देख डाली जाएं पूरी रात का सन्नाटा मिटाने के लिये टके में जो साथ हो ले ऐसी औरत के साथ काटी जाए दिल्ली की गुलाबी ठंडी शामें गुलमोहर के ठूँठ क...
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महेन
फ़िल्म
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[22 Jan 2009 22:24 PM]



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