पढ़ा तुम्हारा गीत-पत्र
एक खामोशी-सी दिखी एक इंतिजार भी दिखा अनसुलझी आंखों में बेकली का सिमटा ज्वार भी दिखा, आशाओं के दीप भी जले विश्वास के सतरंगी स्वप्न भी खिले लगा जैसे हर सांस वीणा के सुर में सुर मिलाकर गुनगुना रही हो, और जैसे कोई काली-सी कोयल एक थके राही को प्रेम का,निश...
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हिमांशु
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[22 Jan 2009 18:53 PM]



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