दांस्ता...

दिल के दरमियाँ धड़कता रहा लफ़्जों का सीना रात भर, सिसकती रही कलम भी, कागज़ भी न दे पाया अपना हाथ, चाँद ने भी करवट ले ली, ओढ़ ली काली चादर रोशनी ने, तारों ने भी फेर ली अपनी आँखें, पिघलता रहा आसमां मोम की मानिंद, थरथराते रहे रात्रि के होठ, तो फिर! कैसे लिखता वो दर्दे... [पूरी पोस्ट]
writer Dr.Bhawna
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[21 Jan 2009 03:03 AM]

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