कामनाओं का कंकाल

अपना घर अनोखे आख्यान की अनुभूति परक प्रवंचना सागर की लहरें छम-छम करती अपने आरोह अवरोह में गुंफित हो हो पुकार रही थीं। सब कुछ । कुछ नहीं। बस । भटकाव और भटकाव और...पंछियों का नीड़ गमन। कहीं बजता राग यमन। पवन का पल्लवित आलोड़न। कौन था कौन कुछ पता न चला। हिला एक... [पूरी पोस्ट]
writer आभा
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[20 Jan 2009 14:41 PM]

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