आग-राग

जिरह मां की कविता 'साक्षी' पढ़ते हुए 9 फरवरी 95 की रात यह कविता लिखी थी। यह कविता चांदनी आग है संकलन में शामिल है। 'साक्षी' यहां पढ़ी जा सकती है। -अनुराग अन्वेषी आग मेरे भीतर है। राख मैं भी हुआ हूं। पर आग, किसी समझौते का नाम नहीं मित्र। बल्कि आग होना नियत... [पूरी पोस्ट]
writer अनुराग अन्वेषी
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[20 Jan 2009 14:14 PM]

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