सागरनामा
विश्वास एक ज़मीं का एहसास इक ज़मीं का संत्रास इक ज़मी का ; ........................... तोड़ने लगता है शिराएँ अंतर्मन की रोकने लगता है धाराएं मन - प्रवाह की ; दो गुनी ताक़त से सर उठाती है अस्मिता हौसले और सर चढ़ जाते हैं जिजविषा पीठ छूकर अस्तित्व निखारत...
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सागर
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[19 Jan 2009 08:45 AM]



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