ओ मेरे आदर्शवादी मन, ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन, अब तक क्या किया? जीवन क्या जिया!!

ठुमरी पिछले दिनों मै मुक्तिबोध की कविताएं पढ़ रहा था और संयोग देखिये वही कविता कुछ अलग अंदाज़ में कुछ मित्रों ने गाया है और आज मेरे पास मौजूद है,अपनी संवेदना भी अब कुछ ऐसे हो गई है, कि बहुत सी बातों का असर हम पर होता ही नहीं,अपने आस पास ही कुछ ऐसे स्थितियाँ... [पूरी पोस्ट]
writer vimal verma
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[18 Jan 2009 14:09 PM]

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