एकालाप

मन की बात अभी तक ज़िंदा है शरीर के भीतर एक और शरीर जो रोकता है टोकता है कटु-वचन बोलकर भर उठता है ग्लानि से अपकर्म करके करता है पश्चाताप पर-दुख-कातरता अभी भी बची है शेष मेरे-तेरे भेद को नहीं मानता यह ठीक है कि उसका जीवन बहुत कम शेष है लेकिन, निराश मत होओ मन क्य... [पूरी पोस्ट]
writer Atmaram Sharma
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[18 Jan 2009 11:29 AM]

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