बादलों के महल में सोया है सूरज

मेरे आस-पास चार दिन पहले ही मकर संक्रांति थी। सोचा रसोई में कुछ बना लूं। दो मन हो रहे थे। मन धुंआ धुंआ था लेकिन बात यह भी सता रही थी कि इस दिन का कुछ तो होना चाहिए। सो खीर चढ़ा दी। खीर की खुशबू से सारा घर महक उठा। इसके बाद खिचड़ी के लिये चावल धोए। चावलों पर जरा सा... [पूरी पोस्ट]
writer MANVINDER BHIMBER
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[18 Jan 2009 04:13 AM]

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