मैं ठहरा गंवार... क्या जानूँ … [ कविता ] श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
गाँव की कच्ची पगडंडी .. हरी दूब से निकल कर हरियाली निगलते कंकरीट के जंगलों में महानगर की …. ऊँची अट्टालिकाओं में अक्सर खो जाता हूँ घबरा जाता हूँ राजपथ पर कई बार युवकों की ‘धूम’ और वाहनों की .. तेज रफ्तार देखकर मै ठहरा गँवार मैं क्या जानूँ … विकास की...
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श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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[18 Jan 2009 00:41 AM]



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