एक ग़ज़ल:इक मुसाफिर ने.....
एक ग़ज़ल प्रस्तुत है- इक मुसाफिर ने कारवां पाया। कातिलों को भी मेहरबां पाया. मेरे किरदार की शाफाक़त ने- हर कदम एक इम्तिहाँ पाया। जुस्तजू में मिरी वो ताक़त है- तुझको चाहा जहाँ-वहाँ पाया। वो जो कहते हैं-मिरे साथ चलो उनके क़दमों को बेनिशां पाया। इक सितारा...
[पूरी पोस्ट]
आनंदकृष्ण
35
2
0
2
8
[17 Jan 2009 09:03 AM]



Shuffle








