सुरमई शाम
चुपके से सुरमई हो गयी थी शाम रात ने सर रख दिया था काँधे पर तारे ने बो दिये थे चन्द्रकिरण से मनके वीराने में धवल, चमकीली चाँद की निबोली अटकी रही थी नीम की टहनी पर नीचे गिरी तॊ बाजुबंध सी खुल गई सुरमई शाम रात के काँधे पर सर रख कर सो गई । ______________...
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रजनी भार्गव
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[16 Jan 2009 21:03 PM]



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