प्रेम पत्रों का प्रेमपूर्ण काव्यानुवाद 5
अब तक जो मैं हठ करती थी, हर इन्सान अकेला होता मुझे पता क्या था जीवन यह अपनों का ही मेला होता. यही सोचती थी हर क्षण केवल मनुष्य अपने में जीता उसके लिये नहीं होता जग, ना वह किसी और का होता. किसी एक का, किसी एक से मिलना परम असम्भव है अलग-अलग दो अस्तित्व...
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हिमांशु
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[16 Jan 2009 19:30 PM]



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