या तो मारो या फिर मरो

रेवा वे आए थे हमारा ताज जलाने और जला कर चले गए। उसके बाद से हम माथा और छाती पीट रहे हैं। पडोसी देश पर दबाव बनाने का ढोल भी लगातार पीटे जा रहे हैं लेकिन हाथ कुछ नहीं आ रहा है। सांप निकल गया और लकीर बची है सो उसे धुने पडे हैं। हमारी पीढी यही देखकर और भुगतकर... [पूरी पोस्ट]
writer ओम द्विवेदी
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[16 Jan 2009 15:28 PM]

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