दिल-ऐ-नादाँ
यह ज़मीन चुप है , क्या कोई साज़िश है या कोई आनेवाला तूफ़ान है या मेरे जनाज़े की तय्यारी है या खुदा नाराज़ है या बस मैं ही हूँ …… हम भटक रहे है , सूखे सहरा में क्या कोई हम - काफिर है क्या को राह - दाफिर है क्या क़यामत पास है , या किसी नए काफिले की आस है...
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Dev
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[16 Jan 2009 14:31 PM]



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