इसीलिये लिखा नहीं गीत नया कोई भी
पीर नहीं उपजी जो तूलिका डुबोता मैं इसीलिये लिखा नहीं गीत नया कोई भी कलियों के वादे तो सारे ही बिखर गये उठे पांव इधर कभी, और कभी उधर गये भावों ने ओढ़ी न शब्दों की चूनरिया एकाकी साये थे जो, वे बस संवर गये फूलों के पाटल पर टँगी नहीं बून्द कोई रजनी में चन...
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राकेश खंडेलवाल
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[15 Jan 2009 20:28 PM]



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