यूं ही नहीं कहा जाता ऐसा
हार क्यों मानूं;..जबकि पता है कि शिल्प के सारे औज़ारों पर ख़ूब पैनी धार लगा रखी है मैंने। और ऐसा भी तो नहीं कि आज तक कोई कविता लिखी ही न हो...चुटकियों में चमत्कार गढ़ता हूं...दुख, सुख, शोक, हर्ष सब को जीकर लिख सकने का हुनर साथ लिए फिरता हूं....
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[15 Jan 2009 16:32 PM]



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