इस बार तरस गये पछुआ हवा को
जाड़ा बीत गया, देखते-देखते। इस बार पहाड़ों की ओर देखा, तो कहीं से हाड़ कंपाने को दौड़ती सनसनाती हवा नहीं आ रही थी। सर्दियां बीत गयीं, दिन की गर्माहट ने जा़ड़े का सारा सार तत्व जाने कब लील लिया, पता ही नहीं चला। आजकल जिस तरह बच्चे एकबारगी जवान से हो ज...
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घन्नू झारखंडी
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[15 Jan 2009 11:38 AM]



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