एक ग़ज़ल
सूखते होंठों पे हमको तिश्नगी अच्छी लगी। जिंदगी जीने की ऐसी बेबसी अच्छी लगी। इस नुमाइश ने दिखाए हैं सभी रंजो-अलम- इस नुमाइश की हमें ये तीरगी अच्छी लगी हैं वसीले और भी, फितरत-बयानी के, लिए पर हमें नज्मो-ग़ज़ल, ये शाइरी अच्छी लगी। आलिमों ने इल्म की बाते...
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आनंदकृष्ण
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[14 Jan 2009 14:31 PM]



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