तुम कौन हो? एक आज़ाद नज़्म
तुम कौन हो? तुम कौन हो, जो दबे पाँव आकर, चुपके से, मेरे कानों में कुछ कह जाती हो? फिर मैं, जैसे मौज-ए-आवारा कोई, वुस्सअ'त-ए-दरिया की संजीदः रवानी में बह जाती हो। तुम कौन हो? तुम कौन हो, इसी ख़याल से, सजता रहे आहंग-ए-नज़्म, कटता रहे हस्ती का सफ़र। मगर...
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Harsha Prasad
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[14 Jan 2009 14:10 PM]



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