सूनी राहें सूना है मन [कविता] अमिता 'नीर'

तृषा'कान्त' सूनी राहें सूना है मन वाट निहारूं किसकी आकुलता बढ़ती जाती है चैन नहीं है पल की सुख बयार सिहरन सी लगती घना अँधेरा छाया क्रूर कुटिल जीवन की रूढ़ी सब धीरज चुक आया पथ कंटकाकीर्ण हुआ है आतप फिर आ घेरे जीवन क्षण भंगुर लगता है व्याकुल नैना मेरे निशि दिन नभ... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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[14 Jan 2009 08:47 AM]

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