इस पोस्ट का कोई नाम नहीं
मेल-मिलाप और परिचित का अपरिचित सा वो ख़्वाब सबसे पहले तो "डोंगरे" भाई से माफ़ी चाहूँगा कि उनके कहे मुताबिक मैं यह पोस्ट रविवार को ही न लिख सका. मेरा मन तो था मगर शाम ढलते ढलते दिल किन्हीं और ख़यालों व मुश्किलों की गिरफ़्त में कुछ ऐसा आया कि दिल में फ़िर...
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DONGRE तृष्णा
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[12 Jan 2009 06:38 AM]



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