चेतना उपेक्षित है...
कैसी विडंबना है जिस दिन ठिठुर रही थी कुहरे-भरी नदी, माँ की उदास काया। लानी थी गर्म चादर; मैं मेज़पोश लाया। कैसा नशा चढ़ा है यह आज़ टाइयों पर आँखे तरेरती हैं अपनी सुराहियों पर मन से ना बाँध पाई रिश्तें गुलाब जैसे ये राखियाँ बँधी हैं केवल कलाइयों पर कैसी...
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डॉ० कुअँर बेचैन
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[12 Jan 2009 03:04 AM]



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