छत पर गुलाब
मेरी छत पर जब कोई गुलाब खिलता है अनेक यादें भी खिल जाती हैं साथ-साथ। बेटी की जब उसका जन्म हुआ और उसकी किलकारियों की शुरूआत । गाँव के अनेक चित्र उभार देता है गुलाब खेतों खलिहानों के और ‘उसके’ जब उसे पहली बार देखा था कुएँ पर हथेलियों के बीच अपना मुँह...
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राम प्रकाश द्विवेदी
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[11 Jan 2009 04:34 AM]



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