याद आती रही......
सर्दियों में कुहासे की चादर ओढ़े सुबह की धूप जैसे रेशम-सी नरम होती है, किरणों के रेशे-रेशे में गरमाहट की जैसे एक आहट होती है, वैसे ही इस गॉंव की याद मन में एक कसक के साथ मौजूद रही। जब भी मैं अकेला हुआ, मुझे महसूस होता रहा कि कुछ छूट रहा है...........
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जितेन्द़ भगत
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[09 Jan 2009 21:40 PM]



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