झूठ

निनाद गाथा झूठ, जब भी बोलता हूँ, थोड़ा सा गिर जाता हूँ, अपनी ही नज़रों में, इस गिरेपन के एहसास को लिए उठता हूँ, और फिर, एक और झूठ, मेरा दमन पकड़ कर मुझे नीचे खींच लेता है, सच बोलना चाहता हूँ, पर घबरा जाता हूँ, मन में अजीब सा भय, कुछ किचकिचा सा डर, जाता है ठहर, अप... [पूरी पोस्ट]
writer अभिनव
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[09 Jan 2009 18:06 PM]

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