चल दिए हैं पूस के तानाशाह

या मेरा डर लौटेगा अभी अभी जड़ था कबूतर वर्फ की पहाड़ सी परत में अभी अभी हुआ है चेतन सूर्य के पहले प्रकाश में रोंया रोंया शुष्क था मौसम मौत की पगडंडी पर अभी अभी पिघला है जीवन की ताल तलैया में घर घर सोया पड़ा था आदमी कुछ सुध कुछ बेसुध अभी अभी जागा है हौसला ताल ठोंक कर ग... [पूरी पोस्ट]
writer Pawan Nishant
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[09 Jan 2009 14:58 PM]

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