प्रण ये भी उठाकर चलिए...
जो भी मिल जाए उसे दोस्त बनाते चलिए, फ़िज़ा मे अमन का एक फूल खिलाते चलिए | खिलखिला के हो रुख्सत जो मिले अब हमसे, अपने कंधो को आँसुओ से भिगोते रहिए | यहाँ बिखरी हो किल्कारियाँ मोती की तरह, पड़े जो राह मे उसे भी गोद उठाते चलिए | हर घर मे उजाला हो फिर मक...
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Tapashwani Anand
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[09 Jan 2009 02:18 AM]



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