हम लड़कियाँ हैं, हमारा घर कहीं नहीं होता।

अपना घर लड़कियों की सामाजिक हैसियत पर १९२५ में लिखे अपने उपन्यास निर्मला में प्रेमचंद ने एक सवाल उठाया था। वो सवाल आज भी जस का तस कायम है। हालात बदले हैं लेकिन लड़कियों की दशा नहीं बदली है। कुछ तबकों में बदली सी दिखती है, उन तबकों में प्रेम चंद के समय में भी... [पूरी पोस्ट]
writer आभा
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[08 Jan 2009 14:17 PM]

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