तुम्हारे सामने ही तो अभिव्यक्त हूँ
कुछ अभीप्सित है तुम्हारे सामने आ खड़ा हूँ याचना के शब्द नहीं हैं ना ही कोई सार्थक तत्त्व है कुछ कहने के लिए तुमसे। यहाँ तो कतार है याचकों, आकांक्षियों की, सब समग्रता से अपनी कहनी कहे जा रहे हैं न तो मेरी तुम्हारे मन्दिर में कुछ कहने की सामर्थ्य है ना...
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हिमांशु
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[07 Jan 2009 19:59 PM]



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