एक पुरानी काविता
८-१०-१९९२ इन शहरों में आकर हम ,दिल से कितने रीते हैं। याद आ रहे वो दिन हमको जो गाँवों में बीते हैं।।१।। कुदक फुदकती उड़न चिरैया,गदराए आमों की डाली शाखा पर बैठे तोता मैना अौ अमराई की हरियाली यहाँ बाहर से सब मधुर-मधुर है,भीतर से सब तीते हैं।याद।२। घलर...
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राम प्रकाश द्विवेदी
काविता
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[07 Jan 2009 02:55 AM]



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