मुहब्बत
दह्सत्गर्दों का मज़हब मैं नहीं जानता। ख़ून-ख़राबे का लहजा भी मुझे नहीं पता। और रही बात सियासतदानों की तो उनके लिए जिगर साहब फ़र्मा ही गए हैं- ''उनका जो फ़र्ज़ है वो एहले-सियासत जानें, मेरा पैग़ाम मुहब्बत है, जहां तक पहुंचे।'' जो हममें तुममें हुई मुहब...
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aalok shrivastav
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[07 Jan 2009 01:02 AM]



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