चहरा ..चहरे पर ...चहरा ...???

Anwar Qureshi तेज़ी से भागती हुई ज़िन्दगी में न जाने कितने चहरे देखें होंगे ... सड़क पर ...चौक ..चौराहों पर ..या किसी बाज़ार पर ...हर चहरा जैसे कुछ कह रहा हो ...कोई अपना कोई अनजाना सा ...किसी चहरे पर खुशी ...तो किसी पर शिकन ...कुछ मजबूर ..तो कुछ लाचार ...कुछ दर्द को... [पूरी पोस्ट]
writer Anwar Qureshi
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[06 Jan 2009 14:12 PM]

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