ऐसे लिक्खाडों से बचाओ !
क्या साहित्यकारों को एक तराजू में तोला जा सकता है ? क्या वे कभी एक मत हो सकते हैं ? आप कहेंगे कि चेतनाशील और बौद्धिक लोग हैं इसलिए एक राय हो नही सकते हैं । साहित्यकारों का संकट यह कि यदि पत्रिकाएँ पचास हैं तो लेखक भी हज़ार । कभी -न-कभी छपने का अवसर म...
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Atul CHATURVEDI
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[05 Jan 2009 11:35 AM]



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