विगत

दृष्टिकोण समय रुकता नहीं है, चलता चला जाता है। पेड़ के तने में जैसे एक और गोला...एक वर्ष का जीवनचक्र बीते हुए जीवनकाल में अंकित होकर लुप्त हो जाता है। लोग ,संदर्भ, संजोग मिलते हैं और बिछड़ जाते हैं। सब कुछ हमेशा नाटकीय नहीं होता। कभी कभार हाँ...। जैसे किसी हाद... [पूरी पोस्ट]
writer Beji
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[04 Jan 2009 10:24 AM]

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