वह डोर ही नहीं बुन पा रहा हूँ

नया प्रयत्न मैं जिधर भी चलूँ मैं जानता हूँ कि राह सारी तुम्हारी ही है, पर यह मेरा अकिंचन भाव ही है कि मैं नहीं चुन पा रहा हूँ अपनी राह । मैंने बार-बार राह की टोह ली पर चला रंच भर भी नहीं, टिका रहा मैं जानता हूँ कि दस-दिगंत में तुम्हारा बधावा बज रहा है, पर यह मेर... [पूरी पोस्ट]
writer हिमांशु
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[03 Jan 2009 19:06 PM]

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