तब लगता है ठगा गया हूँ मैं जीवन के लेन देन में
तब लगता है ठगा गया हूँ मैं जीवन के लेन देन में, जब अयोग्य जुगनू सूरज के सिंहासन पर दिखता है, जब खोटा पत्थर का टुकड़ा कनक कणी सा बिकता है, जब शब्दों का मोल आँकने वाला मापक बहरा है, जब असत्य परपंच अनर्गल संभाषण ही टिकता है, मिलता है सम्मान उसी संभाषण क...
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अभिनव
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[03 Jan 2009 02:48 AM]



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