भूलना चाहता हूँ

विनय पत्रिका कुछ भी भूलता क्यों नहीं बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि ले। लेकिन न जाने कितनी बातें, कितनी घटनाएँ हैं हैं जो चाह कर भी नहीं भुला पाया हूँ अब तक। पढ़ी हुई सैकड़ों कहानियाँ, कविताएँ, देखे हुए हजारों चेहरे मिटते नहीं दिमाग स... [पूरी पोस्ट]
writer बोधिसत्व
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[02 Jan 2009 10:15 AM]

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