डर
डर रिल्के मैं पाँचवी मंजिल पर अपने बिस्तर में लेटा हूँ और मेरा दिन जिसमें कोई रोक-टोक नहीं है, एक ऐसी घडी के चेहरे की तरह है जिसके हाथ नहीं हैं। जैसे कुछ जो बहुत पहले खो गया था, एक सुबह यकायक वापस मिलता है सुरक्षित और सकुशल अपनी पुरानी जगह पर- जैसा ग...
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कुमार अम्बुज
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[02 Jan 2009 02:59 AM]



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