प्रतीक्षा में किस कृष्ण की.... हम मूक जैसे क्यों खड़े हैं
है जमीं ये जल रही आसमां ये जल रहा घर पडोसी का नहीं ये देश मेरा जल रहा आज अरि के हाथ में कुछ सुत हमारे खेलते हैं घात कर के मातृभू संग जो अधम धन तौलते हैं आज उन सबके लिये न्याय का प्रतिकार दो विहंसता है कुटिल अरि अब युद्व में ललकार दो नीर आंखों का हुआ...
[पूरी पोस्ट]
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
51
9
0
9
6
[02 Jan 2009 02:49 AM]



Shuffle








