अन्याय से... आतंक से ... अब पार कर दो

तृषा'कान्त' युग पुरूष' …. तातश्री ! भीष्म पितामह ...!! यही नाम ... मान देकर , बंदी बना दिया युग ने.... कालजयी अपराजेय.. ब्रह्मचारी .... अक्षुणयुवा ... पिता ... पितामह ... सिहासन रक्षक जीवन के पथ पर ... कंटकों से बेखबर ... निडर .. किन्तु... फांसा गया बस कुटिलता क... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
views
34
upvote
7
downvote
0
rating
7
comments
2
[02 Jan 2009 00:13 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix