अन्याय से... आतंक से ... अब पार कर दो
युग पुरूष' …. तातश्री ! भीष्म पितामह ...!! यही नाम ... मान देकर , बंदी बना दिया युग ने.... कालजयी अपराजेय.. ब्रह्मचारी .... अक्षुणयुवा ... पिता ... पितामह ... सिहासन रक्षक जीवन के पथ पर ... कंटकों से बेखबर ... निडर .. किन्तु... फांसा गया बस कुटिलता क...
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श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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[02 Jan 2009 00:13 AM]



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