GULDASTE - E - SHAYARI
दिल तो होगा पर न होगी उसमें जान,सांसें तो होगी पर न होगा अरमान,ख़्वाब जो था पर अब न होगा आशियाँ,लिख दी है हमनें रुसवाई की दास्तान !
Mar 20 2010 11:12 AM
दिल तो होगा पर न होगी उसमें जान,सांसें तो होगी पर न होगा अरमान,ख़्वाब जो था पर अब न होगा आशियाँ,लिख दी है हमनें रुसवाई की दास्तान !
नवरात्रि पंचम दिवस । 20.03.2010 अब तक आपने पढ़ा - फातिमा नावूत
यह न तो कोई पहेली है और न ही किसी तरह की प्रतियोगिता। इसके बावज़ूद मैं यह यह कहना चाहूँगा कि क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आज किसका जनमदिन है? मुझे मालूम है कि शायद ही कोई बता पाए सही सही उत्तर! भले ही आप इसे कितना भी चाह्ते हों या इसकी चर्चा करते हों।
… बाद में पता चला, शेरशाह सूरी की स्मृतियों से जुड़े शहर के कई ऐतिहासिक स्मारक उस दिन की दंगाई आग में स्वाहा हो गए और शहर के सीमावर्ती इलाकों पर नजर गड़ाए लोगों ने मुस्लिम परिवारों के वहां से हटते ही उनपर कब्जा कर लिया। … चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ
मातृभूमि की सेवा करने वाले सैनिक क्या अलग मिट्टी के बने होते हैं...क्या वो आपके-हमारी तरह इंसान नहीं होते...सरहद पर दुश्मन से मोर्चा लेते हुए शहीद होने वाले रणबांकुरों की रगों में क्या कुछ अलग तरह का लहू दौड़ता है...आज एक पिता की नज़र से बताता हूं आपको
माननीय डार्विन जी ने कभी फ़रमाया था कि मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे । उनसे आज तक साइन्टिस्ट्स साहिबान सहमत न हो सके तो भला हम ही क्यों होते ? लेकिन कभी कभी ऐसा लगता है कि उनकी बात में पूरी सच्चाई तो चाहे न हो मगर वह पूरी तरह ग़लत भी नहीं है । वे एक पादरी थे ।
आज देश के एक वरिष्ठ पत्रकार से बात हुई... बात दुआ सलाम के बाद महिला आरक्षण और फिर शिया धर्म गुरु कल्बे जव्वाद के शर्मनाक बयान पर आकर रुक गई... वरिष्ठ पत्रकार महोदय ने हमारी प्रतिक्रिया जाननी चाही...हमने कहा- कौम के लिए इससे ज़्यादा डूब मरने की बात क्या
कल हमारी बेटी के स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग थी ..,जब हम वहाँ पहुंचे तो देखा कि अजब ही दृश्य था ...एक हॉल में कचहरी की तरह लगीं कुर्सी- मेज़ और खचाखच भरे लोग ..आप उसे सभ्य मच्छी बाजार कह सकते हैं .हर पेरेंट को एक -एक विषय के लिए सिर्फ पांच मिनट पहले से ही
पता नहीं सोने को आदिकाल से लोगों ने अपने सर पर क्यूँ चढ़ा रखा है. कभी-कभी टेलिविज़न पर आने वाले एक विज्ञापन को देखकर मन में अक्सर यही ख्याल आता है. उसमें दिखाया गया है कि सोना पीढ़ियों को जोड़ता है. जबकि हकीकत यह है कि सोना पीढ़ियों से लोगों को तोड़ने का काम
सुखदा-----कहानी भाग --4 बेशक माँ के कपडों से बू आ रही थी मगर आज सुखदा को वह भी भली लग रही थी। आखिर खून अपनी महक दे रहा था। उसे अभी भी याद है जिस दिन वो शारदा देवी के साथ जा रही थी माँ कितना रोई थी,तडपी थी उसे किस तरह जोर से सीने से लगाया था मगर पिता ने
मेरी अपनी एक ज़िद हैरहने की, कहने की और उस ज़िद का एक फलसफ़ा ।यूँ तो दर्पण टूट ही जाता हैपर आकृति तो नहीं टूटती न !उसने मेज पर बैठी मक्खी कोमार डाला कलम की नोंक सेक्या मानूँ इसे ?विगत अतीत में दलित हिंसा की जीर्ण वासना काआकस्मिक विस्फोट
छ सौ रुपल्ली में साल भर लड़ने वाला भर्ती कर रखा है मैने। कम्प्यूटर खुलता है और यह चालू कर देता है युद्ध। इसके पॉप अप मैसेजेज देख लगता है पूरी दुनियां जान की दुश्मन है मेरे कम्प्यूटर की। हर पांच सात मिनट में एक सन्देश दायें-नीचे कोने में प्लुक्क से उभरता
छन छन्न छनमेरी पायल बोलती जाती और तुम मुदित हुए जाते होआँगन में अंगना बनी मैंडोल रही हूँपायल की झंकार रस घोल रही हैहक़ है मेरी पायलको बोलने का पर मुझे नहीं !!तुम क्यों मुझे बोलने दोगे पर होठ मेरे अब और प्रतीक्षा नहीं करेंगे
हां तो आप सबको रामप्यारे उर्फ़ "प्यारे" का सलाम नमस्ते! पिछले सप्ताह की ताजा खबर यह रही कि वार्षिक होली कवि सम्मेलन में ताऊ का भी कविता पाठ का नंबर आया. और ताऊ इसके लिये आशीर्वाद लेने माता रामप्यारी जी के आश्रम पहुंच गया.ताऊ ने कहा कि वो गजल पढना चाहता
बर्फ़ ही बर्फ़..... जेसा की एक बार दिनेशराय द्विवेदी, पं.डी.के.शर्मा"वत्स" अन्य कई ब्लांगर मित्रो ने कई टिपण्णियो मै कहा कि हम ने आज तक बर्फ़ गिरती हुयी नही देखी, तो मेने वादा किया था कि जब भी अगली बार बर्फ़ पडी तो मै विडियो फ़िल्म बना कर आप को गिरती
भारत भलमनसाहत दिखाते हुए जब भी पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाता है, पाकिस्तान किसी न किसी बहाने कश्मीर को बीच में ले आता है...63 साल से यही कहानी चली आ रही है...दोनों देशों के बीच 176 बार बातचीत हो चुकी है...लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात...लेकिन
आज Mumbai Mirror (लोकल अखबार) में एक खबर पढ़ी तो सोचा आप सब से बाँट लूँ. आजकल अखबारों में हत्या,लूटपाट,धोखा धडी की ख़बरों से ऐसा पटा होता है कि ऐसी कोई खबर पढो तो लगता है हाँ ज़िन्दगी सांस ले रही है. उम्मीद मिटी नहीं है.ईमानदारी, मानवता सब इस दुनिया में
ज़्यादा टेंशन ठीक नहीं , आओ मूड चेंज करें।यहां ब्लॉग लिखा जा रहा है ,कोई महाभारत का युद्ध नहीं लड़ा जा रहा है ।कल हमारे प्रिय भाई आदरणीय श्री तारकेश्वर गिरी जी ने एक ऐतिहासिक ब्लॉग लिखा । ऐतिहासिक भी वह कई वजह से कहलाने का हक़दार है ।प्रमुख वजह तो यह बनी
जब भी उसने हक की बात की जमाने ने कहा ना री अंततोगत्वा नाम पड़ गया उसका नारी **** निगाहों में क्यों न उभरे निशान सवालिया देखते नहीं देकर ‘एक’ उन्होंने तो सवा लिया **** सुनते थे कि प्यार से लबरेज होकर मुस्कराती हैं हसीना लाख जतन किया पर वो तो हसी ना
एक नवयुवक है। इसी साल पढ़ाई खत्म होगी। कैम्पस साक्षात्कार में उसे बढ़िया नौकरी भी मिल गई है। कई जगह से रिश्ते आने शुरू हो गए हैं। अभी कुछ ही दिन पहले तक केवल एक विशेष कार, एक बड़ा टी वी, फ्रिज़, (बड़ा कठिन है इस सूची को बनाना! कुछ छूट गया तो? एक बेसिक सूची
1-मैं अबोलाएक भूला सा वेदमंत्र हूँ,खामियों से लथपथमैं लोकतंत्र हूँ.तंत्र हूँ, स्वतंत्र हूँ द्रष्टि में मगरओझल मैंआत्मा से परतंत्र हूँ.कहने को बढ़ रहा हूँ मैं.पर जड़ों में न झांकियेवहां से सड़ रहा हूँ मैं.लोक को धकेलतापरलोक की मैं राह में,कुछ मुसीबतों की
हम रोज ही कितना कुछ लिखते हैं। अपने लिखे को लेकर झगड़ा भी करते हैं। कभी कोई हमारे साहित्य की चोरी कर लेता है तो हम उसे धमकाते भी हैं। कभी कोई कागज उड़कर इधर-उधर हो जाता है तो कितना नाराज होते हैं अपने घर वालों पर? एक-एक शब्द को सहेज कर रखते हैं। अपनी
नोट: फिलहाल टिप्पणी सुविधा मौजूद है! मुझे किसी धर्म विशेष पर उंगली उठाने का शौक तो नहीं था, मगर क्या करे, इन्होने उकसा दिया और मजबूर कर दिया ! हमारे मुस्लिम समाज के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने पिछले कुछ समय से इस हिन्दी जगत में न सिर्फ नफरत का आतंक फैला
प्रभो! आओ, आओ.....हम इस समय तुम्हे बडे दीन होकर पुकार रहे हैं। तुम तो दीनों की बहुत सुनते थे। सुनते क्या थे, तुम तो दीनों के लिए थे ही। क्या हमारी न सुनोगे! देखो जरा इस ब्लागजगत को एक नजर देखो तो सही। पारस्परिक ईर्ष्या द्वेष नें यहाँ का सत्यानाश कर के रख
कहते हैं शब्दचित्र कलाकृति हैं, हृदय में उठते भावों के रंग से कलम की कूचि से कागज पर चित्रित. कवि, शब्दों को चुनता है, सजाता है, संवारता है और उन्हें एक अनुशासन देता है कि शब्द अपने वही मायने संप्रषित करें जिनकी उनसे अपेक्षा है. हर शब्द नपा तुला, रचना को
अब और इस दिल का क्या होगाइतना तन्हाँ है कितना तन्हाँ होगा सारे के सारे अक्स मुझे फ़रेब लगे कोई चेहरा तो कहीं सच्चा होगा मुझे सच का आईना दिखाने वाले शायद तेरी आँखों का धोखा होगादेखा कई बार मैंने पीछे मुड़ कर मेरे लिए भी कहीं कोई खड़ा होगा
पता नही आजकल रिश्ते इतने नाजुक क्यों होगये हैं? और आभासी रिश्ते तो वाकई पल पल इधर उधर बिखरते नजर आते हैं. कभी कभी तो इस पत्थर की फ़र्श पर लिखे शब्दों की तरह नजर आने लगते हैं. अक्सर सोचता हूं कि क्या यही रिश्ते हैं? “रिश्ते” रिश्तों के ये बंधन क्या एक
समुद्र किनारे मछुआरों के सुंदर से गांव में एक नौका खड़ी है...एक सैलानी वहां पहुंचता है और मछुआरों की मछली की क्वालिटी की बड़ी तारीफ़ करता है...सैलानी पूछता है...इन मछलियों को पकड़ने में तुम कितना वक्त लगाते हो...एक-स्वर में जवाब मिलता है...ज़्यादा
प्रेम मेरे सबसे जिम्मेदार चोले मुझे नाचना सिखला दे चाह! मुझे छुपा सत्य बतला दे मैंने जो प्रेम बांटे हैं उसमें कितने कांटे हैं ? मैंने लिफाफों से कहा है; खत, खुलो मेरे पास जला कर राख करना है तुम्हें अभी अपनी विनम्रता की आग में
पल पल अविरलनिर्बाध सदा भावो मेंबहता रहता हैपग पग पर हर दममखमल साराहों में साथ वो रहता हैकण कण में पृथ्वी केजिसका अस्तित्वसमाहित हैत्रण त्रण के मूल मेंछुपा हुआउसका सन्देशकुछ कहता हैकस्तूरी से मृग का जूऐसा अपना भीनाता हैगिर गिर कर फिरउठजाने काजो हमको पाठ
मकड़जालग्रस्त और इतिहास बोध ‘शून्य कुछ लोग कह रहे हैं कि हिन्दू कभी किसी धर्म को बुरा नहीं कह सकता । मेरी पोस्ट पर मौजूद टिप्पणियां उनकी ग़लतफ़हमी दूर करने के लिए काफ़ी हैं परन्तु फिर भी एक पूरी पोस्ट में वर्णवादी ग्रन्थों के प्रमाण देकर उनके दिलों को पूरी
हिन्दी ब्लोग संकलकों में ब्लोगवाणी सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह प्रायः समस्त हिन्दी ब्लोग्स के अपडेट्स को एक ही स्थान पर दिखाता है और अधिकांश हिन्दी ब्लोगर्स नये पोस्ट की जानकारी के लिये ब्लोगवाणी का ही सहारा लेते हैं। हिन्दी ब्लोग जगत के लिये ब्लोगवाणी का
सुन तेरे चेहरे पर गुलाब सी खिली मधुर स्मित नज़र आती है मुझेजब तू दूर -बहुत दूरनिंदिया के आगोश मेंस्वप्नों के आरामगाह मेंविचरण कर रहा होता हैतेरे सीने के मचलते ज्वार यहीं भिगो जाते हैं मुझे मेरे तड़पते जज्बातों को तेरी
तुम्हारे यकीं का इंतजार करते करते अब थक चुकी हूं मैं फ़िर भी तुम्हें आया नहीं यकीं मुझ पर अब तक उससे तुम नहीं मेरा आत्म सम्मान टूटता है और मैं तुम्हें यकीन दिला के रहूंगी तब तलक जब तलक सांस में सांस रहेगी। अन्तिम सांस अंतिम क्षण तक तुम्हारे इंतजार में
अपने नए कलेवर में ब्लोगवाणी रूप रंग और सौन्दर्य की इन्द्रधनुषी छटा बिखेर रही है. कई नए आकर्षण इससे आ जुड़े हैं .इन्ही में एक पसंद नापसंद का भी विकल्प है -मतलब आपको फ्रीडम है कि किसी भी पोस्ट को उसके आपत्तिजनक कंटेंट के कारण आप उसके
कई दिन के बाद वो घर आया हैपर चेहरे से लगता वो पराया हैदामन से उसके लिपटे, सो गए उसने आधी रात मुझे जगाया हैयकीं नहीं उसे मेरी मोहब्बत कासबने उसे बहुत सताया हैन चिनार के बुतन शाम के साए एक सहज सा रस्तान पिआउ न टेकबस तन्हाई से लिपटेमेरे कदमचलते ही
सदियों से कागज, सभ्यताओं के विकास का वाहक बना हुआ है । विचारों के आदान-प्रदान में व सूचनाओं के संवहन में कागज एक सशक्त माध्यम रहा है। समाचार पत्र, पुस्तकें, पत्रिकायें और ग्रन्थ किसी भी सभ्य समाज के आभूषण समझे जाते हैं। यही कारण है कि किसी देश में प्रति
एक अमेरिकी और एक भारतीय बार में बैठे ड्रिंक पर ड्रिंक चढ़ा रहे थे...भारतीय अपना ग़म गलत करने के लिए अमेरिकी से बोला...जानते हो, मेरे घर वाले भारत में मेरी शादी गांव की एक लड़की से कराना चाहते हैं...अरेंज्ड मैरिज...कहते हैं कि हमारा रिश्ता बचपन में ही तय