रिन से भी ज़्यादा सफ़ेद-हबीबगंज-भोपाल एक्सप्रेस
आपमें से कई लोगों ने हबीबगंज एक्सप्रेस में सफ़र किया होगा। निज़ामुद्दीन से चलकर भोपाल और हबीबगंज जाने वाली ट्रेन। इसकी सफाई मुझे हमेशा से आकर्षित करती रही है। गज़ब का अनुशासन दिखता है इस ट्रेन। रेल यात्रा का जितना अनुभव रहा है उसके आधार पर कह सकता हूं कि
Mar 11 2010 05:53 PM



लीजिए बहनो और भाइयो, यदि आप किसी भ्रम में जी रहे थे तो तुरन्त उससे बाहर निकल आइए। यदि आप भारतीय नारी को महान मानने वालों का लिखा पढ़ते यह सोच रहे थे कि शायद आपका ही घर परिवार एक अपवाद है अन्यथा शेष भारत में तो जो वह कहे वही होता है, उसकी आज्ञा सबको
टू ऊ ऊं ऊं ऊं..टू ऊ ऊं ऊं ऊं.. मन डोले मेरा तन डोले... दिल का गया करार रे.. ये कौन बजाये बांसुरिया इकतारे पर यह धुन बजाता जब वो घर के सामने से निकलता..तो वाकई मन डोल जाता. मिट्टी के दिये का बना वो इकतारा...बचपन से उसकी घुन लुभाती आई. जब भी वो गुजरता,
अगर ये दुनिया है तो कैसी दुनिया है ग़लत बातें मैं सह नहीं सकती सही बात मैं कह नहीं सकती अगर ये दुनिया ऐसी है तो भला मेरे ये किस काम कीसफ़र करते हैं अब हम दोस्तों कि अब यहाँ मैं रह नहीं सकती आप लोगों का धन्यवाद...मिथिलेश, मैंने जो भी कहा है,
मठ मन्दिरों में अकेले न भेजें महिलाओं को वक्त साबित कर रहा है कि मस्जिद हो या मंदिर सिस्टम सिर्फ़ इसलाम का ही कामयाब है । इसलाम का यह नियम है कि औरत जब घर से बाहर जाये तो वह घर के किसी महरम रिश्तेदार पिता भाई पति आदि को ज़रूर साथ ले ले । इस तरह बहुत से
हम तो स्वभाव से ही साधू हैं, जैसे मंदिर में रोज भाव भक्ति से अगरबत्ती जला कर फ़ूल चढाते हैं ठीक वैसे ही भिनसारे उठ कर अपनी पोस्ट लिखते हैं सब काम छोड़ कर....... और फिर बटन दबा कर ब्लाग जगत
अख़बारों की सुर्ख़ियों में किडनी कांड के बाऱे में तो आपने सुना ही होगा। कभी कभी गलत तरीके से किया गया सही काम भी एक काण्ड बन जाता है। आज विश्व गुदा दिवस ( वर्ल्ड किडनी डे ) है।आइये जाने , कैसे रोका जा सकता है , किडनी फेल होने को ताकि फिर कोई नकली डॉक्टर
आ जाअब तोएक बारतड़प कीहर हदपार हो चुकी हैबिन आंसू केरोती हूँतुझ बिनकैसे जीती हूँजानता हैतू भीमगर फिर भीमुझे तड़पाकरकितना सुकूनतुझे मिलता होगाये पता है मुझेअहसास सिर्फअहसास होते हैंउनका नामनहीं होता नाइसीलिएतुझे अहसासनाम दियाऔर तूनेउसे सार्थककर दियाअहसास
यह जिन्दगी के मेले बहुत अजीब होते है, बेसे तो यह पोस्ट मैने पराया देश ब्लांग पर ही डालनी थी, लेकिन वहां अभी थोडा उदासी का माहोल है, फ़िर इसे "मुझे शिकायत हे." पर डालने की सोची तो भईया वहां तो पुलिस की नाकेबंदी लगी हुयी है...क्या पुलिस को
इसलाम का अर्थ है ‘ ‘शान्ति ‘ ,ईश्वर का आज्ञापालन , ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण । जो आदमी इस मौलिक गुण से युक्त हो वह मुसलिम कहलाता है ।पवित्र हदीस के मुताबिक़ मुसलिम वह होता है जिसके ‘शर से अन्य लोग सुरक्षित हों ।वर्ण व्यवस्था के अत्याचार से त्रस्त बहूत
ये इस ब्लोग की पांच सौवीं पोस्ट है , या शायद उससे एक ज्यादा ...है न बधाई देने की बात ....मगर नहीं वाह मत कहिएगा ......आज मन वाह नहीं आह कहने को कर रहा है .............आह ....!!!!!!!!!!!मैं भीष्म नहीं ,मैं अजर नहीं ,मारो , मर जाऊंगा ,मैं कभी भी अमर नहीं
कुछ दिन पहले की घटना है, सुबह के आठ बजे मैं तैयार हो रहा था। उर्वशी (मेरी बिटिया, उम्र 6 साल, कक्षा पहली) कमरे में आती है और कुछ ढूंढने का नाटक करती है। आमतौर पर वो स्कूल के लिये तैयार होने के बाद इस कमरे में नही आती। मैं समझ गया कि कुछ गडबड है और यह
खामोशियाँ जब बोलती हैं ज़ेहन का बर्क - दर- बर्क खोलती हैं होठ हिलते नहीं हैं मगर मन ही मन ना जाने कितने राज़ खोलती हैं आँखों में उतर आते हैं कितने ही सैलाब जब खामोश लबबोलते हैंलफ्ज़ जुबां सेनिकलते नहींफिर भीतास्सुरातचेहरे केबोलते हैं .आज मेरे
चेलों ने परेशान कर रखा है बड़े गुरूजी को। सारे चेले उनके ऊपर "मान ना मान मैं तेरा मेहमान" बन कर पिल पड़े हैं। रोज ऐसा पोस्ट लिख देते हैं जिससे साबित हो जाये कि बड़े गुरूजी की सोच "अधजल गगरी छलकत जाय" है, बड़े गुरूजी "आँख के अन्धे और नाम के नैनसुख" हैं। बड़े
प्यार वो हमको बेपन्हा कर गए,न जाने क्यूँ हमें तन्हा छोड़ गए,चाहत थी उनके इश्क़ में फ़नाह होने की,पर वो वादा करके फिर लौट के न आए !
अभिषेक, एक पत्रिका में कोई रिपोर्ट लिखने के उद्देश्य से एक कस्बे में आता है. पर वहाँ की धीमी गति से गुजरते जन जीवन से एक दिन में ही बहुत ऊब जाता है. तभी एक दुकान पर उसे एक नारी कंठ सुनायी देता है.वह चेहरा नहीं देख पाता.उसे शची की आवाज़ लगती है और वह
आज गुरूवार को मै महेन्द्र मिश्रा फिर आपके लिए एक छोटी सी चिट्ठी लेकर आपके समक्ष उपस्थित हूँ . आजकल मुझे टी.वी. में अखबारों में सदनों की हंगामाखेज कार्यवाही देखने में बड़ा आनंद आ रहा है . सदन चाहे लोकसभा का हो राज्यसभा का हो या नगरनिगम का हो . मेरी समझ से
सुनिए अविनाश वाचस्पति से प्रभाष जोशी के सुपुत्र संदीप जोशी ने आज जनसत्ता में लिखा है कि .... खुशदीप जी कह रहे हैं भारत में बस भारतीय ही नहीं... यहाँ गिरीश जी ने कहा यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी हैशिखा
मुझे लगता है कि महिला आरक्षण से ऐसे नेताओं की मुसीबत बढने वाली है जिनके घर में राजनीतिक आकांक्षाएं लिये कई कई महिलाएं होंगी…कोई देवरानी होगी, कोई जेठानी होगी, कोई ननद होगी। पहले जब तक पुरूषों को ही लडना होता था तो ठीक था,
छत्तीसगढ़ में ब्लागरों की बाढ़ आई हुई है कहा जाए तो गलत नहीं होगा। छत्तीसगढ़ का डंका और ब्लाग जगत में बज रहा है और यह बात सभी जानते हैं। हम बता दें कि हमारे साथ हरिभूमि में काम करने वाले करीब एक दर्जन पत्रकार मित्र ब्लागर हैं। इनमें से कुछ नियमित लिखते
अगर ये कहा जाए कि विगत वर्षो में सबसे ज्यादा प्रगति विज्ञान क्षेत्र ने किया तो गलत ना होगा । पिछले पच्चीस वर्षों मे तो इलेक्ट्रानिक्स के क्षेत्र में हुए आविष्कार के कारण सूचनातंत्र का पूरा जंजाल घर-घर में पहुँच गया है । पूरे विश्व ने उन्नीसवीं शताब्दी
साहिर कडी १दो दिनों पहले ८ मार्च को अज़ीम शायर साहिर लुध्यानवी का जन्म दिन था. वह भी विश्व महिला दिवस के दिन!! क्या ये एक महज़ संयोग माना जाये या इसके पीछे विधाता का कोई डिज़ाईन है, कोई बडा़ मंतव्य है?शायद हां. आप साहिर के अश’आर सुनें ,पढे़, तो उसमें
धनहीन हूँ भिखारी, मैं दान माँगता हूँ। झोली पसारकर माँ! मैं ज्ञान माँगता हूँ।। दुनिया की भीड़ से मैं, बच करके चल रहा हूँ, माँ तेरे रजकणों को, माथे पे मल रहा हूँ, निष्प्राण अक्षरों में, मैं प्राण माँगता हूँ। झोली पसारकर माँ! मैं ज्ञान माँगता हूँ।। अज्ञान
आज बहुत दिन बाद लिखने बैठा हूँ। अब स्वास्थ्य ठीक है। असल में हुआ ये था कि होली की छुट्टियों में अल्मोडा की तरफ कहीं जाने का इरादा था। लेकिन ऐन टाइम पर बुखार चढ गया। बुखार से पहले नाक बही, खांसी हुई। नाक ठीक हो गयी, बुखार ठीक हो गया। खांसी अब भी है। जब भी
मित्रों, नमस्कार! बहुत दिनों बाद कोई पोस्ट लिखने बैठा हूं। लीजिये आज पढ़िये एक गीत और बतायें कैसा लगा ? आप चाहें तो मेरी बेसुरी आवाज में भी सुन सकते हैं-उदास राहों में गा रहा हूंतुझे मुहब्बत बुला रहा हूंसुनो अंधेरे के हमनवाओं मैं एक दीपक जला रहा हूंवो
बोया पेड़ बबूल का फिर क्यूँ आम ढूढते हो जीजिविषा मरी पड़ी है और तुम संग्राम ढूढ़ते हो खुद ही कहकर खुद ही सुन लो कौओं से करते कान की बातें, हद है भाई! * चप्पे-चप्पे पर कामी देखो रिश्तों की नीलामी देखो वर्तमान का पता नहीं पर तुम तो अब आगामी देखो हैवानों की
कल मेने एक पोस्ट डाली थी,मदद के लिये, जिस मै हमे बहुत उपयोगी सलाह मिली, उस परिवार को भी बहुत हिम्मत मिली, मेने यह सारी की सारी पोस्ट ओर कामेंट उन्हे पढवाये, क्योकि यहां तो सब को पता नही इस लिये उलटा सीधा ही बोल रहे थे, लेकिन आप सब की सलाह से उन के सभी
ये बगल वाली फोटो अभिषेक ओझा की है! इनकी पोस्ट के चलते ही हमको सब काम-धाम छोड़कर चर्चा को प्राथमिकता में ऊपर लाना पड़ा। अभिषेक ओझा की पोस्टें सहज-सरल और शरीफ़ टाइप की होती हैं। हड़बड़ लेखन से अलग। गणित की बातों को सुगम और रोचक अंदाज में पेश करके अभिषेक ने यह
वृक्षों के मन-भाव को,कौन करे महसूस,नेता,पुलिस,बिचौलिए,बाँट रहें सब घूस.सबसे रो कर कह रहें,पीपल,बरगद,नीम,सिर्फ़ प्रदर्शन ही बना,हरियाली का थीम.वृक्ष लगाओ,धरा बचाओ,गावत फिरे समाज,पर करनी ना कछु दिखे,कहत न आवे लाज.हरियाली हरि सी भई,दुर्लभ हुई दरश,शाख मचलना
प्रतिवर्ष फरवरी की समाप्ति के बाद मार्च के शुरूआत होते ही शनै: शनै: ठंढ की कमी और गर्मी के अहसास से जैसे जैसे कुछ सुस्ती सी छाने लगती है , वैसे वैसे मेरा मन मस्तिष्क 1988 की खास पुरानी यादों से गुजरने लगता है। नौकरी छोडकर गांव लौटकर दादाजी के
मुझे नफरत है मुझे नफरत है तुम्हारी हर एक बात से, मुझे नफरत है तुम्हारे उस नाम से (आवेश) जो तुम्हारे माँ- बाप ने बिना सोचे तुम्हें दिया मुझे नफरत है तुम्हारी हर बात से जो
महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पास होने के बाद पूरे देश में तालियां पीटी जा रही हैं। वाजिब भी है, भारत जैसे देश में महिलाओं को यह हक गए-गुजरे देश बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी बाद में मिला है। लेकिन इस सारे शोर में यह बात दबकर रह गई है कि इस बिल के
मैंने, चाहे कोई भी कक्षा पाक कला की नहीं लगाई .पर मैं,रोटिया सेंकती ,मीठा पकाती.मैं लीपती चूल्हा,घर बुहारती.यूँ तो, मैंने चित्रकारी भी नहीं सीखी कभी.पर मैं दहलीज़ के अंदर रंगोली बनाती.कच्ची दीवारों पे फूल पत्ते तराशती.भले ही, अर्जुन की तरह ध्वनि सुनकर
इस लेख के पहले दो भाग आपने पढें होगें। अगर नही पढें है तो यहां पढ सकते है.....भाग-१, भाग-२।जो लोग कहते है कि आप अरबी कुरआन गैर-मुस्लमान को देगें और आपको सज़ा मिलेगीं तो मै कहता हुं की कोई हर्ज नही। अगर अल्लाह तआला मुझे ज़िम्मेदार ठहरायेगें अरबी कुरआन
जी हाँ, अब आपको यह अपनी टिपण्णी के माध्यम से बताना है कि अरविन्द मिश्रा जी आप भी कितने प्रतिशत ब्लॉगर चाहते हैं कि अरविंद मिश्र जी Lucknow Bloggers' Association लख़नऊ ब्लॉगर्स असोसिएशन" से जुड़ जाएँ. उसकी कई वजह हैं और उनमें से
कोई २५-३० साल पहले पचास रुपये का एक नोट चलन में आया था। उसके पिछलेहिस्से में संसद का चित्र बना हुआ था। पर इमारत पर तिरंगे के स्थान पर सिर्फ 'पोल' था, झंडा नहीं छप पाया था। कुछ दिनों बाद उस नोट को हटवा लिया गया। क्या किसी सज्जन के पास वैसा नोट है ? यदि हो
इन्साफ की दिशा में अन्याय हो रहा हैआरम्भ किस विद्या का अध्याय हो रहा है।।सोना बता रहे हैं शब्दों को सब हमारेमिट्टी मगर हमारा अभिप्राय हो रहा है।।आदेश बन रहा है अपशब्द भी किसी काऔ राय रख के कोई बे-राय हो रहा है ।।शोषण अवैध घोषित है, जिस जगह वहीं परशोषित
सबिता जी की याद आ गयी । उन्हें सबिता बैनर्जी कहा जाए या सबिता चौधरी । या फिर ये कहा जाए कि वो जाने-माने और हमारे प्रिय संगीतकार सलिल चौधरी की पत्नी हैं । लेकिन इस सबसे ऊपर उनकी एक और पहचान है । सबिता बैनर्जी एक बहुत मीठी आवाज़ हैं । लेकिन
Shuffle























