वक़्त वक़्त कि बात है
कल हमारी बेटी के स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग थी ..,जब हम वहाँ पहुंचे तो देखा कि अजब ही दृश्य था ...एक हॉल में कचहरी की तरह लगीं कुर्सी- मेज़ और खचाखच भरे लोग ..आप उसे सभ्य मच्छी बाजार कह सकते हैं .हर पेरेंट को एक -एक विषय के लिए सिर्फ पांच मिनट पहले से ही
Mar 19 2010 07:45 PM



छ सौ रुपल्ली में साल भर लड़ने वाला भर्ती कर रखा है मैने। कम्प्यूटर खुलता है और यह चालू कर देता है युद्ध। इसके पॉप अप मैसेजेज देख लगता है पूरी दुनियां जान की दुश्मन है मेरे कम्प्यूटर की। हर पांच सात मिनट में एक सन्देश दायें-नीचे कोने में प्लुक्क से उभरता
सुखदा-----कहानी भाग --4 बेशक माँ के कपडों से बू आ रही थी मगर आज सुखदा को वह भी भली लग रही थी। आखिर खून अपनी महक दे रहा था। उसे अभी भी याद है जिस दिन वो शारदा देवी के साथ जा रही थी माँ कितना रोई थी,तडपी थी उसे किस तरह जोर से सीने से लगाया था मगर पिता ने
माननीय डार्विन जी ने कभी फ़रमाया था कि मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे । उनसे आज तक साइन्टिस्ट्स साहिबान सहमत न हो सके तो भला हम ही क्यों होते ? लेकिन कभी कभी ऐसा लगता है कि उनकी बात में पूरी सच्चाई तो चाहे न हो मगर वह पूरी तरह ग़लत भी नहीं है । वे एक पादरी थे ।
पता नहीं सोने को आदिकाल से लोगों ने अपने सर पर क्यूँ चढ़ा रखा है. कभी-कभी टेलिविज़न पर आने वाले एक विज्ञापन को देखकर मन में अक्सर यही ख्याल आता है. उसमें दिखाया गया है कि सोना पीढ़ियों को जोड़ता है. जबकि हकीकत यह है कि सोना पीढ़ियों से लोगों को तोड़ने का काम
मेरी अपनी एक ज़िद हैरहने की, कहने की और उस ज़िद का एक फलसफ़ा ।यूँ तो दर्पण टूट ही जाता हैपर आकृति तो नहीं टूटती न !उसने मेज पर बैठी मक्खी कोमार डाला कलम की नोंक सेक्या मानूँ इसे ?विगत अतीत में दलित हिंसा की जीर्ण वासना काआकस्मिक विस्फोट
एक पोस्ट पर चर्चा कई बार हुई है पर आज हम एक चिट्ठाकार पर चर्चा करना चाहते हैं। गजब खब्ती चिट्ठाकार है ये। वन कैननॉट ड्रेग हीम टू... ब्लडी कीचड़ आव चिट्ठाकारी, अगला वही रहेगा जो है पर यू कान्ट ड्राइव हीम अवे आइदर ... अगला बना रहेगा। आप टिपियाए या
अंग्रेजी के 26 अक्षर तो रटे हुए हैं आपको, पूछने पर तत्काल बता देंगे। किन्तु यदि मैं पूछूँ कि हिन्दी के बावन अक्षर आते हैं आपको तो क्या जवाब होगा आपका? अधिकतर लोगों को यह भी नहीं पता कि अनुस्वार, चन्द्रबिंदु और विसर्ग क्या होते हैं। हिन्दी के पूर्णविराम
आजादी को छ: दशक बीत चुके हैं, प्रतिवर्ष बजट मे नयी-नयी योजनाओं का आगाज होता है। फ़िर वही नारे लगते हैं गरीबी हटाओ, गरीबी हटाओ। मानवाधिकार की बाते गर्माती हैं वातावरण को 2 रु किलो गेंहुँ-चावल बांटने की योजना का शुभारंभ होता है, कोई भुखा नही मरेगा। सबको
ऐसे ही कुछ अटपटे शब्द ....मैंनादाननाजुककमजोरहताशमायूसतुम्हे लगती रहूमगरयाद रखकांधे मेरेतेरी बन्दूक के लिए नहीं है ....छोटे हाथ मेरेनाजुक अंगुलियाँभले होंगी मेरीभार उठाएंगीखुद इनकाजरुरत हुई तो ....जीतना मैं भी चाहूंतू भीबस जुदा हैरास्ता तेरा - मेराजीतना
मेरे जिस्म में ठहरी आत्मारोज मुझसे कहती है ..मुझे मैला मत करना !आज तुम्हारी हू,कल किसी और का होना है !तुम अपनी झूठी वाणी सेमुझे मत पुकारना !अपनी लालसा भरी आंखो सेमुझे मत देखना !मुझे उजळी रहने दोअपनी सच्चाई से ,अपनी विनम्रता से !मुझे शुद्धता देनाअपने
क़ल के विवाद के बाद अब एक और नया विवाद शुरू हो गया है.अभी अभी मोहल्ला लाइव पर नज़र गई तो ये पोस्ट दिख गई। अब आप खुद ही तय करें....हुसैन पर हल्ला मचाने वाले शिवसेनावादियों का रचना और उसकी प्रक्रिया से कोई लेना देना नहीं होता। वे बस मंगलाचरण के शोर में
डां अनवर जमाल साहब आप ने पिछले दिनों मैं हिंदु धर्म के बारें मैं जो ज्ञान बघारा हैं वो किस काबिल है वो तो मेरे पास शब्द नहीं पर क्यों कि आपकी फोटो देखकर पढे लिखे इंसान लगते हो इसलिए कुछ कहने का मन किया…… कभी मौका लगे तो हरिद्वार जरूर जाना …..और गंगा मैं
कलयुग के गुरुओं का क्या हाल है इसका एक नमूना भिलाई में तब देखने को मिला जब वहां के एक स्कूल के प्राचार्य ने छात्राओं को पास कराने का प्रलोभन देकर उनके साथ अश्लील हरकतें करते हुए अपनी वासना की भूख मिटाने का असफल प्रयास किया। इस प्रयास में यह कलयुगी गुरू
मुझे क्या पता था कि पिछला ट्रेलर आप सबको खूब पसंद आएगा ..हम तो सोच रहे थे कि सब कहेंगे कि अरे कहां फ़ंस गए झाजी ..आप तो बस अपनी टरेन दौडाईये ….धडाधड पटरी बिछा के …और हमको भी ई ससुर लाईव राईटर के स्यापे से मुक्ति मिलेगी …अरे ई इतना स्लो है कि का
"चर्चा मंच" अंक-93 चर्चाकारः डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" आइए आज का "चर्चा मंच" सजाते हैं- कृष्ण मुरारी प्रसाद सिंगरौली, मध्य प्रदेश, से लिखते हैं दो पुरानी कथाएँ। जिनका सम्बन्ध जोड़ा है इन्होंने नोटो की माला से- मायावती की माला, अन्धों का हाथी और सुराही
विश्राम मत करेंरहें सावधान औरसतर्कमत पूछें कोई तर्कबस सावधान रहेंसतर्क रहेंइमेज पर करें क्लिकऔर जान लें जानकारीफेसबुक और आपके कंप्यूटर की जानके लिए आ रही है बहुत भयानक महामारीपर इसमें मत बनने दें बीमारीऔर सावधान रहें।इस पोस्ट के लिंक कोअपने मित्रों और
भीड़ से निकल,शोर-गुल से दूर हो,जिम्मेदारियों को अलहदा कर खुद सेरात को चुपके से,नींद के ताबूत में अपने आपको रखहर रात की तरह गहरी नींद में सोईआँखों के बंद दरवाजे परठक ठक हुई,स्वप्न बन आया कोईपकड़ था मेरामुझे उठाकर ले गया साथ अपने वहाँ, देखती थी रोज जिसके
नवरात्री का पर्व चल रहा है, हर तरफ़ मंदिरों मे भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है देवी दर्शनों के लिए। हमारे यहां से भी बहुत सारे भक्त डोंगरगढ़ की बम्लेश्वरी माता के दर्शन करने पद यात्रा पर निकल चुके हैं। गत वर्ष हमने भी लगभग 145किमी मीटर की पद यात्रा की थी तथा
&nb
तीन टाँग के ब्लैकबोर्ड की,मूरत कितनी प्यारी है।कोकिल जैसे इस स्वरूप की,महिमा जग से न्यारी है।कालचक्र में बदल गया सब,पर तुम अब भी चमक रहे हो।समयक्षितिज पर ध्रुवतारा बन,नित्य नियम से दमक रहे हो। बना हुआ अस्तित्व तुम्हारा, राम-श्याम बन रमे हुए हो। विद्यालय
ॐ जय ब्लोग्वानी प्रभु जय ब्लोग्वानीजो कोई तुमको ध्याताहॉट में स्थान पाता ॐ जय ब्लोग्वानी .........घर , परिवार , नौकरी सब दॉव पर लगा देता खाना, पीना ,सोना ब्लॉगर सब भूल जाता उलटी सीढ़ी टिप्पणियाँ करके बस टी आर पी
इन्टरनेट का उपयोग दिनो दिन बढ़ रहा है, और आम तौर पर लोग इन्टरनेट की अभासी दुनिया मे अपने नये सम्बन्ध (दोस्ती-विवाह) आदि जोड़ने लगे है। चिट्ठाकारी से जुड़ाव के कारण मैने विभिन्न लोगो से मिलना हुआ है, उनसे मिलना किसी न किसी प्रकार की नजदीकी दे जाती
इस दुनिया में अपना कोई घर ना बने तो अच्छा है ( आत्म - चिंतन)इस दुनिया में अपना कोई, घर ना बने तो अच्छा हैजो फक्कड़ बन घूम रहा है , वो ही साधू सच्चा हैये दुनिया परदेस है इसमें ,रहने कि क्यूँ ठान रहासभी पराया है इस जग का, जिसको अपना मान रहाये सपनों कि नगरी
एक भटकन….. जो जन्म के इस पार से मृत्यु के उस पार तक भी हमारा पीछा नहीं छोडती है … मन प्राण आत्मा इस भटकाव के जाल से निकल नहीं पाती है …उसे भान भी नहीं होता अपनी पराधीनता का आशाएं हैं कि हमें भटकने के लिए मजबूर करती हैं और हम अपनी निजता
कल एक सवाल पूछा था मैंने एक ख़ास बुद्धिजीवी वर्ग से, समयाभाव के कारण आज उस पर एक यथोचित लेख न लिख सका, जिसके लिए क्षमा ! मैं उन सभी मित्रों का आभार व्यक्त करना चाहूंगा, जिन्होंने अपने महत्वपूर्ण विचार उस लेख पर टिप्पणी के रूप में रखे ! और जो कुछ आज के
आप सबने पिछली पोस्ट में देखा और खूब देखा अनिल भाई जी ने तिलक किया टोपी पहनायी बढ़िया मगर साहब जिस अपनेपन और सादगी से मंद-मंद मुस्कुराते हुए पहली भेंट के रूप में भरे मंच पर ठहाकों के बीच लगभग आठ इंच लंबा और पौने तीन इंची व्यास का बचपन की गलतियों जैसा
" रुख हवा की न बदले यही चाहती हूँ "रुख हवा की न बदले यही चाहती हूँऔर ज़फा से रहूँ दूर यही चाहती हूँदूरियाँ तो न चाही सिफर ही मिलायादों को बसा लूँ यही चाहती हूँतबस्सुम तो है पर शिकन कम नहींबस आँसू न निकले यही चाहती हूँजिन्दगी के सफ़र से तो दहशत नहींपर
हमारे प्राचीन महर्षियों नें अपने दीर्धकालीन अनुभवों के पश्चात यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया है कि प्रत्येक रत्न एक ग्रह विशेष की किरणें ग्रहण करके धारक व्यक्ति के शरीर में पहुँचाने का कार्य करता है। इसी अनुभव के आधार पर उन्होने यह निश्चय किया कि किस ग्रह
… बाद में पता चला, शेरशाह सूरी की स्मृतियों से जुड़े शहर के कई ऐतिहासिक स्मारक उस दिन की दंगाई आग में स्वाहा हो गए और शहर के सीमावर्ती इलाकों पर नजर गड़ाए लोगों ने मुस्लिम परिवारों के वहां से हटते ही उनपर कब्जा कर लिया। … चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ
करीब दस महीनों के बाद आज अपने ब्लॉग पर कुछ लिख रही हूँ। इतने दिनों न लिखने के बहुत ढेर सारे कारण हैं, उनको फिर कभी बताउंगी पर अभी बताती हूँ कि मैं क्यों फिर लिख पा रही हूँ...............इतने दिनों लिखा तो नहीं पर बहुत कुछ पढ़ा और बहुतों को पढ़ा। उस बहुत
संसद के अंदर-बाहर महिला आरक्षण बिल को लेकर हंगामा था। तमाम न्यूज चैनलों में बहस चल रही थी कि आरक्षण बिल पास होगा या नहीं। रिपोर्टरों से लेकर विशेषज्ञ इस मुद्दे पर जूझ रहे थे। अचानक हिन्दी के तीन टॉपमोस्ट राष्ट्रीय न्यूज चैनलो के पर्दैं पर ब्रेकिंग न्यूज
दो पाठिकाओं ने एक जैसे प्रश्न मेरे पास सलाह के लिए भेजे हैं--1-मेरे पिता जी की मृत्यु 2004 में हो गई है, हम पाँच भाई बहने हैं दो भाई और तीन बहनें हैं। सभी बहनों की शादी हो चुकी है। मेरे पिता जी ने कोई वसीयत नहीं लिखी है। मेरे पिता जी के गाँव में खेत हैं।
फूल इंसानों से ज्यादा खूबसूरत होते है ,लेकिन कुछ इंसान फूलो से भी ज्यादा खुबसूरत होते है ,जैसे की आप सभी मेरे ब्लोगेर्स मित्रो
Shuffle


























