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बदन से सरकते कपड़े--------------------[मिथिलेश दुबे]
बदन से सरकते कपड़े , जी हाँ आजके वर्तमान परिवेश में आपको आसानी से दिख जायेगा । अब ये आपको हर गली नुक्कड़ , बाजार हो या शोपिग माल छोटे कपड़ो मे लड़कियां आपको आसानी से दिख जायेंगी । कल तक छोटे कपड़े रैंप पर कैटवाक करती मॉडल्स अपने डिजाइनर्स के कलेक्शन को
Mar 09 2010 05:24 PM



पिछ्ले कुछ दिनों बहुत से मुद्दों और तथाकथित विमर्शों पर जिस तरह की खींचतान , परोक्ष प्रत्यक्ष आरोप प्रत्यारोप , आक्रोश, खिन्नता , और भी जितने विशेषण होते होंगे सभी एक साथ देखने पढने को मिले । और जैसा कि अपेक्षित ही था कि एक बार फ़िर से धुरियां बनी या शायद
सठियाने की भी एक सीमा होती है पर ये बुड्ढा तो सठियाने की सीमा पार कर गया है। कब्र में पाँव लटकाये बैठा है पर ब्लोगिंग का शौक नहीं गया। है तो पिद्दी जैसा पर अपने आपको बहुत बड़ा ब्लोगर बताता है। अकल तो ऐसी है इसकी कि कहे खेत की और सुने खलिहान की पर कमली
डॉ अरविन्द मिश्रा का एक चुभता हुआ कमेंट्स मेरा ध्यान उनकी ओर खींच ले गया है " चलिए आप उदासीन और तटस्थ रहकर इसी तरह बीच बीच में आकर अपनी घोर चिंता व्यक्त करते रहा करिए -ब्लागजगत का जो होना है वह तो हो ही जाएगा " और मुझे लगा कि जैसे
आज की ये पोस्ट इरफ़ान भाई को समर्पित है...देश के अग्रणी कार्टूनिस्ट इरफ़ान को हिंदी अकादमी ने वर्ष 208-09 के लिए काका हाथरसी सम्मान देने की घोषणा की है...43 साल के इरफ़ान भाई का सम्मान पूरे ब्लॉगवुड का सम्मान है...अपने ब्लाग इतनी सी बात से इरफ़ान भाई
प्रार्थना - हे भगवान हमें मोटी होने का हक दो ! हमें अपनी छाती और बाहों पर बाल उगाने का हक और हिम्मत दो ! हमें देह को सजाने और न भी सजाने का फैसला लेने की बुद्धि दो ! हमें हिम्मत दो कि हमसे आइना जब सवाल करे हम उसे उलट दें ! हमें हिम्मत दो कि हम छाती को
वाह, आरक्षण के पक्षधर अचानक उसके विरोधी हो गए! जब आरक्षण खुद को नौकरी में मिलना था तब तक उसके लिए युद्ध में डटे हुए थे। तब उसके विरोधी सामाजिक न्याय के विरोधी दिख रहे थे, अकेले मलाई खाना चाहने वाले लगते थे। तब आरक्षण समर्थक चाहते थे कि अगड़ी जाति वाले
टू ऊ ऊं ऊं ऊं..टू ऊ ऊं ऊं ऊं.. मन डोले मेरा तन डोले... दिल का गया करार रे.. ये कौन बजाये बांसुरिया इकतारे पर यह धुन बजाता जब वो घर के सामने से निकलता..तो वाकई मन डोल जाता. मिट्टी के दिये का बना वो इकतारा...बचपन से उसकी घुन लुभाती आई. जब भी वो गुजरता,
मिथिलेश ने उस लौ को और ज़्यादा प्रज्जवलित कर दिया है जिसे मैं पिछले एक साल से ब्लॉग जगत में रौशन करने की जद्दोजहद कर रहा हूँ, मिथिलेश और मुझे और ज़्यादा संबल मिला जो अरविन्द मिश्रा जी जैसे सम्मानित ब्लॉगर ने इसमें अपना अमूल्य समर्थन कर इस लौ को
लीजिए बहनो और भाइयो, यदि आप किसी भ्रम में जी रहे थे तो तुरन्त उससे बाहर निकल आइए। यदि आप भारतीय नारी को महान मानने वालों का लिखा पढ़ते यह सोच रहे थे कि शायद आपका ही घर परिवार एक अपवाद है अन्यथा शेष भारत में तो जो वह कहे वही होता है, उसकी आज्ञा सबको
हाल ही में नेट पर देखा की कुछ विशिष्ट जन को भगवान राम और माँ सीता के विवाह के सन्दर्भ में कुछ भ्रान्ति है. कुछ तर्क वाल्मीकि रामायण से लेकर ये निष्कर्ष निकला जा रहा है की विवाह के वक़्त माँ सीता की उम्र महज छ साल की थी, जो कतई सही नहीं है.जैसा की हम सब
अर्थात इंद्र ने ऋजिश्वा राजा के साथ मिलकर कृष्ण नाम के असुर की गर्भवती स्त्रियों को मारा था । { ऋगवेद 1/101/1 }यो वर्चिनःशतमिंद्रः सहस्रमपावपद्अर्थात इंद्र ने वर्ची के सौ हज़ार पुत्रों को भूमि पर सुला दिया अर्थात मार दिया । { ऋगवेद 2/14/6 }इसलाम का अर्थ
‘ आदमी एक जिज्ञासु प्राणी है । सैक्स और और विवाद उसे स्वभावतः आकर्षित करते हैं। प्रस्तुत पोस्ट के माध्यम से आदरणीय चिपलूनकर जी ने इसलाम के प्रति ब्लाग जगत के इसी स्वाभाविक कौतूहल को जगा दिया है । आदमी नेगेटिव चीज़ की तरफ़ जल्दी भागता है । मजमा तो उन्होंने
छुट्टियाँ कब बीत जाती हैं, पता भी नहीं चलता। ड्युटी पर आये हुये ये चौथा दिन और फिर से वही अहसास कि जैसे यहीं हूँ सदियों से। सतरह सालों बाद इस बार उपस्थित हो पाया था होली पर अपने गाँव में और क्या खूब होली जमी। अबके इधर कश्मीर में खूब-खूब बर्फ गिरी
एक अमेरिकी नागरिक भारत घूमने आया और फिर वापस अपने देश गया...वहां वो अपने एक भारतीय दोस्त से मिला...दोस्त ने बड़ी उत्सुकता के साथ पूछा कि अमेरिकी को भारत कैसा लगा...अमेरिकी ने जवाब दिया...भारत एक महान देश है...इसका स्वर्णिम प्राचीन इतिहास है...प्राकृतिक
हाल ही में एमएफ़ हुसैन द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्र वाले मामले में “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता”(?) के पक्षधर और “कलाकार की कला” के बारे में बहुत (कु)चर्चा हुई (कुचर्चा इसलिये क्योंकि उन चर्चाकारों की निगाह में डेनमार्क के कार्टूनिस्ट द्वारा
~~मुझे नहीं होना बड़ा~~आज फिर सुबह-सुबह से शर्मा जी के घर से आता शोर सुनाई दे रहा था. मालूम पड़ा किसी बात को लेकर उनकी अपने छोटे भाई से फिर कलह हो गयी.. बातों ही बातों में बात बहुत बढ़ने लगी और जब हाथापाई की नौबत आ पहुँची तो मुझसे रहा नहीं गया. हालांकि
कल ९ मार्च मेरी दिल अज़ीज़ और सबकी चहेती वाणी गीत और ज्ञान प्रकाश जी की वैवाहिक वर्षगाँठ थी...आज एक बार फिर हृदय से उन दोनों को बधाई...आप सब भी इसमें शामिल हुए थे...युगल जोड़े को अपनी शुभकामनायें, प्यार और आशीर्वाद देने के लिए...आज की पोस्ट इसी शुभ
लोटा एक साधारण सा शब्द है लेकिन इसकी महिमा निराली है.........मनुष्य के जीवन से जुड़ा हुआ है...... इसके बिना काम चलना बहुत ही कठिन है........लोटे के लुढ़कने से लोटना शब्द का भी निर्माण हुआ होगा...........मनुष्य जब पी कर मदमस्त हो जाता है तो कहीं पर भी लोट
पिछले भाग से जारी ...राजमार्ग से होते हुए हम क़स्बे और फिर खेतों के बीच रेंगती पक्की सड़कों पर दौड़ रहे हैं । हवा से सुर मिलाते सर र र ... आवाजें आ रही हैं । लंठ युवा होलिका दहन की तैयारियों में लगे हैं और मैं अम्माँ के चूल्हे पर चढ़े तवे की आँच का अनुभव
मैं रामप्यारे उर्फ़ "प्यारे" उर्फ़ ताऊ का गधा आपका स्वागत करता हूं और ब्लागर्स कार्यशाला - 2010 का आंखो देखा हाल आपको सुनाता हूं.ब्लागर्स कार्यशाला मे आशा के विपरीत जबरदस्त भीड जुटी. जिन ब्लागर्स ने अपना पूर्व मे रजिस्ट्रेशन करवा लिया था उनके लिये प्रथम
जब बचपन में हमारे दादा जी हमें स्कुल में भरती करवाने गए तो हमने देखा कि वहां एक बुढा खूसट सा धोती कुरता पहने टेबल कुर्सी लगाये बैठा है. दादा जी को देखते ही बोला " आइये महाराज! कैसे आना हुआ?" दादा जी ने कहा कि ललित को स्कुल में भरती करना है. ५ साल का तो
वो होंठ तेरे कानों पर धरे कुछ सुना गए को गीत तेरे, मेरे अधर गुनगुना गए वो खुशबू तेरी रगों में मेरी लोट गई वो जुल्फ तेरी मेरी पेशानी उलझा गई वो सांसें मेरी दर्द से तारी हो गईं वो बलाएं तेरी मुट्ठी में
सबसे पहले तो महिला आरक्षण विधेयक के राज्य सभा में पास होने पर बधाई। पहली बार हिन्दुस्तान में जाति आधारित राजनीति की हार हुई है। जाति आधारित राजनीति बेचारी नज़र आई है। आरक्षण का मैं समर्थक रहा हूं। मानता हूं कि दुनिया में इससे बेहतर और कारगर कोई सामाजिक
अगर ये दुनिया है तो कैसी दुनिया है ग़लत बातें मैं सह नहीं सकती सही बात मैं कह नहीं सकती अगर ये दुनिया ऐसी है तो भला मेरे ये किस काम कीसफ़र करते हैं अब हम दोस्तों कि अब यहाँ मैं रह नहीं सकती आप लोगों का धन्यवाद...मिथिलेश, मैंने जो भी कहा है,
हमारी पिछली फ़िल्म ताऊ की शोले को आप लोगों की वजह से अपार सफ़लता मिली. कुछ विशेष परिस्थितियों के चलते हमें यह फ़िल्म बंद करनी पडी और हमने आपसे वादा किया था कि ताऊ की शोले का दूसरा पार्ट जल्द ही आपकी सेवा में प्रस्तुत करेंगे. परंतु हमारे
क़रीब तीन साल पहले जब ब्लौग जगत के कुछ उत्साही सेकुलरपंथियों ने हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं की मर्यादा का अतिक्रमण करती कुछ पोस्टें चढ़ाई थीं तो धुरविरोधी* ने पूछा था : “रंगीला रसूल भेज दूँ, छापोगे क्या?”एम एफ़ हुसैन साहिब को लेकर जो बहस छिड़ी हुई है,
१८ वीं और १९ वीं सदी के बहुत से पश्चिमी विद्वानों ने ये भ्रम फ़ैलाने की कोशिश की है कि भारत में ३०० - ४०० ईसा पूर्व जिस ब्राह्मी लिपि का विकास हुआ उसकी जड़े भारत से बाहर की हैं ,और इससे पहले भारत किसी भी तरह की लिखित लिपि से अनजान था.इसी सम्बन्ध में डॉ.
रुख को कभी फूल कहा आँखों को कवँल कह देते हैंजब जब भी दीदार किया हम यूँ ही ग़ज़ल कह देते हैंवो परवाना लगता है कभी और कभी दीवाना साजल कर जब भी ख़ाक हुआ शमा की चुहल कह देते हैंवो आके खड़े हो जाते हैं जब सादगी लिए उन आँखों मेंवो पाक़ मुजस्सिम लगते हैं हम ताजमहल
सबकी तरह मैं भी माँ से कहानियाँ सुनते बड़ी हुई। उन कहानियों के विषय अधिकतर देशभक्ति के हुआ करते थे। राणा प्रताप का राष्ट्र प्रेम से मौत तक समझौता ना करना। उनकी बच्ची का कहना वो कौन शत्रु है जिसने,
हम सब को वनवास दिया है एक छोटी सी पैनी सी तलवार मुझे भी दे
हाय एवरीवन...कैसे हैं आप लोग? होली निकल गई पर कसक रह गई. वैसे ही जैसे रस्सी जल गई पर बल नही निकले. होली बीत जाने के बाद अक्सर यह समझा जाता है कि पुरानी कडवाहट खत्म हुई. पर यहां तो माजरा ही कुछ अलग है. फ़तवे पर फ़तेवे दिये जारहे हैं..ले फ़तवे...दे
अर्जेंट, अर्जेंट, अर्जेंट। एक कोई मेरे या मेरी प्राइवेट फ़ॉलोअर हैं। मतलब मेरे ब्लॉग के या की फ़ॉलोअर जो दुनिया को बताना नहीं चाहते या चाहतीं कि वो मुझ जैसे का ब्लॉग फ़ॉलो कर रहे हैं या कर रही हैं। मसला ये है कि उनकी वजह से ऐसी टेक्निकल दिक़्क़त आ रही है
व्यंग -- बुढापे की चिन्ता समाप्त आज कल मुझे अपने भविष्य की चिन्ता फिर से सताने लगी है। पहले 20 के बाद माँ बाप ने कहा अब जाओ ससुराल। हम आ गये। फिर 58 साल के हुये तो सरकार ने कहा अब जाओ अपने घर । हम फिर आ गये। फिर दामाद जी ने सोचा सासू मां अकेले मे हमे
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